Sunday, February 21, 2010

रुपेश शर्मा

जीवन में बहुत से व्यक्ति ऐसे होते हैं जो भले ही कम साथ होते हों, लेकिन उनकी उपस्थिति हमेशा से ही गौरव का विषय होती है, इसी क्रम में हमारे एक अन्य मित्र हैं रुपेश शर्मा। उनका भी साथ कक्षा से ही है, लेकिन वक़्त की आपा-धापी में उनसे मुलाकातें के ही बराबर होती हैं, लेकिन सिर्फ इस कारण हमारे सम्बन्धों में और आत्मीयता में कभी कोई कमी नहीं आयी है। सन् 1993 से हमारा और उनका साथ है। उम्र का एक हिस्सा उनकी दोस्ती के साथ का है।

समय का खेल ऐसा रहा कि उनके विवाह में हम शामिल हो सके, उससे भी बढ़कर यह बुरा लगता है कि उनको गये साल पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी, उसके बाद भी मिल सके हम उनसे। अच्छे दोस्त होने का कम से कम इतना फायदा होता है कि, वह हर बात और परिस्थितियों को समझता है और शिकायत कभी नहीं करता है। ऐसा ही हमारे मित्र ने भी किया है, उन्होनें अच्छे मित्र होने का पूरा आभास कराया है।

अजब है ही यह कि उनसे मुलाकातें बहुत ही कम होती है, लेकिन इसका तनिक भी प्रभाव हमारे सम्बन्धों पर नहीं हैं आज भी उनसे ही वही मित्रवत् प्रेम और अपनापन है।

Friday, February 19, 2010

क्षमा


जीवन की आपा-धापी में काफी समय तक सबसे दूर चला गया था, कुछ समय का आभाव था, कुछ तकनीकि का भी आभाव हुआ। नव वर्ष की पूर्व संध्या पर ही हमने गॉव चले गये, जहॉ इंटरनेट की सुविधा मौजूद नहीं है। है भी तो बाज़ार में, जहॉ जाकर इतना समय देने का हमारा मन नहीं किया। घर में बैठकर आराम से अपनी दुनिया में रहना ज्यादा बेहतर लगता है हमको, इसके मुकाबले की हम किसी कैफे में जाकर काम करें।

आज सिर्फ क्षमा मॉगने ही आए हैं हम। किसी और दिन किसी विषय के साथ उपस्थित होगें।

Wednesday, December 30, 2009

वर्ष नव, हर्ष नव, जीवन उत्कर्ष नव।








आयने ते परायणे दुर्वा रोहन्तु पुष्पिणीः ।
हृदाष्च पुण्डरीकाणि समुदस्य गृहा इमे ।।



ऋग्वेद - 18/30/16



अर्थात्




आपके मार्ग प्रशस्त हों,
उन पर पुष्प हों, नयी कोमल दूब हों,
आपके उद्यम व आपके प्रयास सफल हों,
सुखदायी हों और आपके जीवन सरोवर में
मन को प्रफुल्लित करने वाले कमल खिलें हों।



नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये, इस आशय और अटल विश्वाश के साथ कि, इस नव वर्ष में आपकी प्रत्येक इच्छा, प्रत्येक स्वप्न, प्रत्येक कामनाओं की पूर्ति जल्द से जल्द हो।

जीवन के किसी भी मोड़ पर, कभी भी किसी भी मुश्किल से आपका सामना न हो।

जीवन के प्रत्येक क्षण में, आपके चेहरे पर विजय की मुस्कान और माथे पर विजयश्री का तिलक सदैव ही जगमगाता रहे।

किसको कह दूँ









आज सिर्फ इतना ही कहना है कि, अपनी एक पुरानी रचना निगाह में आ गई, क्यों और किस बात इस रचना का जन्म हुआ, यह आज हमको याद नहीं, लेकिन बस अच्छी लगी आज तो हमने इसको आपके साथ बांटने की सोची और उसी सोच का नतीज़ा है कि, यह बस आप सब के लिए:----


तुमसे बेहतर फिर अब मैं किसको कह दूँ,
अपना कहके तुमको अपना किसको कह दूँ।

यारों ने कोशिश की, कि भूलें तुमको,
तुम मैं ही हूँ अब, किसको कह दूँ।

उनकी अपनी भी कुछ चाहत होगी,
अपनी ही मर्जी सारी, किसको कह दूँ।

हर दिल की ख़्वाहिश है एक साथी,
कम मिलेगें सच्चे, किसको कह दूँ।

जीने को साँसों की ज़रूरत ही कहाँ रही,
चाहतें ही रखे हैं ज़िन्दा, किसको कह दूँ।

‘‘उन्मत्त’’ आज़मा के तोहमत देते हमको,
बेबात ही बदनाम हूँ, किसको कह दूँ।



‘‘उन्मत्त’’

Tuesday, December 29, 2009

ठीक नहीं





ज्यादातर व्यक्ति किसी भी कृत्य के लिए अपने को दोष देकर के मुक्ति पाना चाहता है, चाहे उसने वह कार्य किया हो या न किया हो। ऐसा उन परिस्थितियों में ज्यादा होता है जब अमुक अपकृत्य किसी प्रिय द्वारा कर दिया गया हो। इससे इतर भी व्यक्ति अपने आप को तमाम तरह से छलने का प्रयत्न करता रहता है, लेकिन बहुत दिन तक ऐसा कर नहीं पाता है। कहीं न कहीं उसको इस बात आभास हो ही जाता है कि, वह वास्तव में गलत है। लेकिन यह आभास ज्यादातर काफी देर में होता है जो गलत है, सही समय पर इस बात का आभास करना ज्यादा श्रेष्यकर है।




खुद को खुद छलना ठीक नहीं,
अपने दिल से लड़ना, ठीक नहीं।

माथे पर बस वक्त की धूल है,
वक्त से यूँ डरना, ठीक नहीं।

मेरी मानो, ऐसा कम चाहा मैंने,
अपने ज़ज्बातों से लड़ना, ठीक नहीं।

मेरा क्या है प्यार नहीं है साँसों से,
पर बेवक्त तुम्हारा मरना, ठीक नहीं।

जो लूट रहा है वो सच्चा है,
ऐसी बातें करना, ठीक नहीं।

‘‘उन्मत्त’’ दे पाता तो दे देता,
यूँ भी मेरा खुदा बनना, ठीक नहीं।


‘‘उन्मत्त’’

Sunday, December 20, 2009

ज़िन्दगी








अर्सा पहले हमने एक रचना की थी, हमारी यह रचना जीवन के विरूद्ध रची गयी है, आज हमारे मन ने कहा कि, क्यों न आज उसे आप सब के लिए, आप लोगों के सामने लाया जाए। तकरीबन साढ़े नौ साल हो गये हैं इस रचना को लिखे हुए, बहुत बार हमने इसको पढ़ा है, यह उतनी ही भाती है आज भी, जितना हमको यह, लिखे जाने पर भायी थी। हमारे एक मित्र ने हमको सलाह दिया था कि, इसे छोटा कर दें तो ज्यादा प्रभावशाली हो जाएगी। उन्होनें मात्र इस रचना के लिए नहीं, उस समय की लिखी हुयी रचनाओं के बारे में अपनी राय दी थी, लेकिन हमारा मन नहीं माना कभी, कभी भी हमारे मन ने यह नहीं कहा कि, हम इसे छोटा कर दें, उसके मूल स्वरूप में ही आज, आप सबके लिए लाए हैं। लम्बी होने के कारण सम्भव है कि, यह आपको बोझिल करे। उसके बावजूद भी हम अपनी इस रचना को आप तक पहुंचा रहें हैं।

यह मात्र एक रचना ही नहीं है हमारे लिए, जीवन के प्रति इसी रचना के कारण ही हम उतना लगाव नहीं रखते हैं, जितना सामान्यतः रखा जाता है। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि, हम मौत से डरते हैं, इसलिए इस डर को भगाने के लिए हमने इसकी रचना की है। और इस रचना ने हमको हमेशा ही इस बात के लिए तैयार रखा कि, जीवन पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं हैं, जिस दिन जीवन को देने वाला, जीवन को लेना चाहेगा, तुम्हारे जीवन को ले लेगा और तुमसे एक बार भी नहीं जानना चाहेगा कि, इस जीवन की अभी तुम्हें कितनी देर तक की और आवश्यकता है। जग रचियता के इसी कृत्य के विरूद्ध यह हमारी रचना है।




ज़िन्दगी
क्या है
कैसे कहे
सब की
सब जाने
मेरे लिए
ज़िन्दगी बस
मेरी रखैल है
चार दिन का साथ है बस
जीवन के इस सफ़र में
एक वजह जीने की
एक कारण जीने का
मुश्किल से पटे
इस जीवन में
चार पल का मज़ा ले लेने का
साधन मात्र है
मेरी ज़िन्दगी,
हर तरफ से
ज़िन्दगी को
भोगता हुआ मैं
लगातार निरन्तर बढ़ रहा हूँ
अपनी हमसफ़र
मौत के पास
इस ज़िन्दगी से दूर
बहुत दूर
जहां पर
न मुश्किलों का घर होगा
न उलझनों का डेरा होगा
न कोई दर्द सताएगा
न कोई अपना रूलाएगा
न कोई सम्बन्ध होगा
न कोई सम्बन्धी होगा
न जीए जाने की कशमकश होगी
न रोटी की भूख
न कपड़े का रोना
न किसी छत की चाहत

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इस ज़िन्दगी में रखा क्या है
बस रूलाती ही है
जब
आ ही फॅसा हूँ
मैं तो
उसे साथ रखना ही था
भोगना ही था
झेलना ही था
घर में रहो
या
कहीं बाहर रहो
एक ही चिन्ता
ज़िन्दगी के प्रति
कि
कहीं ठुकरा न दे
और
और किसी को अपना के
मुह छुपाए
कब अपना दामन छुडाए
चलती हुई साँसों को
भागते हुए जीवन को
पलती कल्पनाओं को
बढ़ती इच्छाओं को
अनदेखा कर के
और किसी की
दुनिया बसाने चली जाए
ऐसी ज़िन्दगी के लिए
मेरी ज़िन्दगी में
मेरे मन कोई स्थान नहीं
जो
उम्र की आख़िरी सांस तक
अपने पीछे भगाया करे
जो भाग न पाए
उसे घसीटा करे
इसके बाद भी
जो तैयार न हो
उसे बेमतलब की ये ज़िन्दगी
छोड़कर चली जाती है
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‘उन्मत्त’
इसीलिए कहता है
हर दुनिया वाले से
हर जीने वाले से
ज़िन्दगी को
कमज़ोरी न बनने दो
अपने पर हावी
न होने दो
हमेशा उस पर हावी रहा
इससे पहले कि
ज़िन्दगी भगाए तुम्हे
तुम उससे पहले भागो
तेज
उसकी रफ़्तार से तेज
हैरान हो जाएगी
ज़िन्दगी तुमसे
हाथ न आओ कभी उसके
हर बार जब मौका मिले
जी भर कि
हॅसिए उस पर
नाक में दम कर दीजिए उसके
फिर देखिए आप
कैसे
घुटनों के बल
ये ज़िन्दगी
घसिटती खुद ही आएगी
उस क्षण आप जो चाहे
वह व्यवहार करें
हर चाहत
जो दिल में है
उसके आगे प्रस्तुत करे
ज़िन्दगी की जड़े कमजोर होती है
अगर
आप तेज गए उससे
तो
यह आपकी जीत होगी
आपकी कल्पनाए भी तब
हकीकत का जामा पहनेगीं
हर ख्वाहिश
जो दिल में है
सब की सब
पूरी हो जाएगी
मगर
इसके सिवाए
कि
ज़िन्दगी आपका
साथ नहीं छोड़ेगी
हर कीमत पर यह होगा
कितना भी चाहे उसे
कितना भी प्रताड़ित करे उसे
अन्त
आपका निश्चित है
तो
क्यों गुलाम बने
क्यों ने उसे
गुलाम बनाए हम
इसके बाद भी हर इन्सान
बेवजह उसे पूजता है
लाख मिन्नतें करता है
थोड़ा सा पाने की लालसा में
हाथ जोड़ के गिड़गिड़ाते है
रोते है
मगर
ज़िन्दगी को
कभी तरस नहीं आता
रोने वालों से
उसे आन्नद आता है
और
तो और
उनको वह रूलाया ही करती है
देती कुछ भी नहीं
हमेशा कुछ न कुछ
ले ही लिया करती है
देने के नाम पर
जो उसके पास है
वह लेने लायक नहीं होता
इसलिए मागना नहीं
हर कोई ले लेना चाहते है
ज़िन्दगी से
हाथ बढ़ाकर
छीन लीजिए उससे

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इसलिए मैं
अपनी ज़िन्दगी को
अपनी रखैल कहता हूँ
क्योंकि
मैं
उससे लेकर हमेशा
उसी को डांटता हूँ
उसको जी भर
भोगता हूँ मैं
उसकी हर चीज पर
अपना हक रख़ता हूँ
उसे चाहता भी हूँ
मगर
वह चाहत
जो दिखावा है
एक भूलावा है
ज़िन्दगी को
कि
मैं चाहता हूँ उसे
इसी भरम ज़िन्दगी मेरी
मुझसे कुछ नहीं कहती
मगर
अपनी इस रखैल को
कुछ कीमत भी
अदा करनी पड़ती है
मगर
यकीनन औरों से कम
कीमत होती है
बड़ी खुशियों के लिए
कई छोटी खुशियों को छोड़ना
और
कभी कभी
बड़ी को खुशी को छोड़
तमाम
छोटी छोटी बिखरी खुशियों
को चुन लेता हूँ मैं
उसमें ही जीता हूँ मैं
मगर
कोई चाह नहीं है जीने की
बस साथ निभा रहा हूँ
ज़िन्दगी का
और
निभाता भी रहूगा
मौत तक
वक्त से पहले
ज़िन्दगी को
छोड़ा नहीं जा सकता है
क्योंकि
मौत भले ही
मेरी हमसफ़र हो
मेरी चाहत हो
मेरी ज़िन्दगी हो
पर
मुझे अपनाएगी नहीं
क्योंकि
इस समय मैं
ज़िन्दगी के साथ हूँ
और
मेरी हमसफ़र
मेरे साथ
किसी के और रहते
नहीं आएगी
जब वह आएगी
तब ज़िन्दगी
को जाना होगा
और
वह जाएगी
बस
ऐसे ही लड़ते हुए
ज़िन्दगी से जीते जाना है
ज़िन्दगी का साथ
निभाए जाना है
उस पल तक
वह
खुद न छोड़ दे
अपने बन्धन से
मुक्त न कर दे
अपने ऋणों से
उऋण न कर दे
तब तक मेरी
और ज़िन्दगी की जंग
चलती रहेगी
कभी मैं उस पर
कभी वो मुझ पर
हावी होगी
मगर
मैं जानता हूँ
जीत न मेरी होगी
न ज़िन्दगी की होगी
जीत होगी अगर
कभी तो
सिर्फ़
और सिर्फ़
मौत की
निश्चित ही मौत की
मगर
अनिश्चित दिन।

‘उन्मत्त’

Thursday, December 17, 2009

सन्दीप ओझा




मित्र, यदि जीवन में न हो तो? यह कल्पना करना भी हमारे लिए दूभर है कि, हमारा जीवन मित्रों के बिना कैसा होता या होगा? शायद हमको अस्तित्व को तलाशना पड़ेगा पुनः यदि हमारे जीवन से हमारे मित्रगणों हटा लिया जाए तो। हमारे मित्रों की संख्या बहुत ही कम हैं, लेकिन यह हमारा सौभाग्य है कि, हमारे मित्र उच्चकोटि के व्यक्ति हैं। जीवन 30 से अधिक सालों में, पिछले 16 सालों में हमने अपने जीवन का बहुत समय, अपने मित्रों के साथ गुजारा है। आज जितनी भी सोचने समझने की क्षमता है, वह हमारे अभीष्ट मित्र सन्दीप कुमार ओझा का है, वो इस श्रेय को लेने से सदैव ही इन्कार करते हैं, लेकिन सच को तो बदला ही नहीं जाया जा सकता है। जीवन के झन्झावतों से अगर हमको किसी में उबारने की क्षमता, इस समय यदि इस दुनिया में है तो, वह सिर्फ और सिर्फ सन्दीप के पास ही है, हमें यह कहते हुए भी संकोच नहीं होता है और होगा कि, धरती पर वह हमारे लिए ईश्वर से कम नहीं है, सुनने यह अटपटा लग सकता है, लेकिन जैसा कि, हमने कहा कि, सच तो हमेशा ही रहेगा, उसको बदला नहीं जा सकता है। शायद अपने आप को हमारे लिए ईश्वर ने यही रूप धारण किया हो? शायद के स्थान पर यकीनन का प्रयोग करना उचित समझेगें।

बहुत बार हमने कोशिश की कि, सन्दीप के महत्व को हम जान पाए, लेकिन हर बार विफल हुए हैं, जितना उसके बारे में सोचते हैं, वह उतना ही करीब होता जाता है हमारे। कई बार शब्दों में भी बांधने का प्रयास किया है हमने, मगर वहां पर भी हार ही गये है हम। मित्रता की शुरूआती दौर से हमारे और उसके बीच अक्सर गर्मागम बहसें हो जाया करती हैं, जिसमें हमेशा ही हम ही हारते हैं और हारा ही करें, यही चाहते भी हैं, क्योंकि उस हार से हमको हमेशा ही एक नहीं, कई सीखें मिल जाया करती हैं। 16 सालों की मित्रता में कई अवसर ऐसे भी आए हैं कि, जहां हम लोगों में बातचीत भी नहीं हुयी है, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि, नाराज़गी के कारण हम लोगों ने मिलना जुलना छोड़ दिया रहा हो, वो हमारे घर, हम उसके घर लगातार जाते रहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे सामान्य दिनों में हुआ करता है। जब से दूरसंचार क्रांति आ गयी है, उसके बाद भी कई नाराज़गियाँ हम दोनों के मध्य हुयी है, इसी बरस दो बार ज्यादा ही नाराज़ हुआ है हम पर वह। वैसे सामान्यतः तो हमेशा ही वह हमसे, हमारी आदतांे के कारण नाराज़ हो उठता है। लेकिन हमको तो उसकी बातों की आदत पड़ गयी है, कुछ दिन उसकी बातें न सुने तो, जैसे खाना ही नहीं पचता है। कभी भी सन्दीप से हमने कुछ भी नहीं छिपाया है, यहाँ तक कि, जो कुछ करने की सोच भी लेते हैं उसको भी उसके बताए बिना रह नहीं पाते हैं।

अपनी लाख चाहतों के बाद भी सन्दीप के लिए कुछ पाने में असमर्थ ही रहें हैं, लेकिन फिर भी कहने के प्रयास से कभी भी विमुख नहीं हुए हैं, सफलता कब प्राप्त होगी? इसके बारे में कुछ कह पाना मुष्किल ही है। शायद जीवन भर इसी प्रयास में रहें कि, हम सन्दीप को अपने शब्दों में कह सकें। हमको इस बात की खुषी हमेशा रहेगी कि, हम उसे कभी भी परिभाषित नहीं कर पाए, साथ ही दुआ करतें हैं कि, सन्दीप का व्यक्तित्व ऐसा हो कि, कभी भी, कोई भी उसको परिभाषित ही न कर पाए, कभी कलमबद्ध न कर सके कोई, अथाह, अन्नत हो उसका स्वरूप।


सन्दीप के विषय में हमारी यही चाहत है, यही हरसत है --------

घर जाएगें, फिर आएगें,
मर जाएगें, फिर आएगें।

भूल न जाना अपने इस साथी को,
मर जाएगें, फिर आएगें।

छूट गया है हाथों से हाथ, मगर,
मर जाएगें, फिर आएगें।

निभाने हैं वादे अपने हमको,
मर जाएगें, फिर आएगें।

जा रहें हैं, सैर को कुछ दिन,
मर जाएगें, फिर आएगें।

‘‘उन्मत्त’’ कौन है, जन्नत में मेरा,
मर जाएगें, फिर आएगें।